मन की बात हिंदी कविता – Mann Ki Baat Hindi Poem

Mann Ki Baat Hindi Poem

मैं न मन की स्वछंद स्वमनी बनुगी

मन हो नील गगन में उड़ाने का

मुठी भर आकाश छूने का

अपनी स्वतंत्रता को महसूस करने का

पर मैं पिंजरा ही चुनुगी।

मैं न मन की स्वछन्द स्वमनी बनुगी

मन हो समस्त संसार बिचरण का

भगवान की सुंदर रचना को देखने का

दुनियाभर की खुशी पाने का

पर मैं घर के कमरे में ही सिमट जाऊँगी।

मैं न मन की स्वछन्द स्वमनी बनुगी

मन हो भाइयो जैसा सम्मान पाने का

उनकी तरह नख़रे दिखने का

थोड़ा विरोध करने का

भाइयों जैसा दुलार पाने का

पर मैं मर्यादाओं की सीमाओं में बंध कर रह जाऊँगी।

मैं न मन की स्वछन्द स्वमनी बनुगी

मन में हो चाहे कुछ कर दिखने का

भाइयों के सामान अधिकार पाने का

हो गर्व आपको अपनी बिटिया पे भी

ऐसा कुछ कर जाने का

पर मैं आपके डर को अपना डर बनुगी।

मैं न मन की स्वछन्द स्वमनी बनुगी

मन में हो चाहे कितना भी दुख

निराशाओं में घिरा हो मन

अपनों की वजह से टूटा हो विश्वास

पर मैं होठों पर मुस्कान रखूंगी।

मैं न मन की स्वछन्द स्वमनी बनुगी

मन में हो चाहे अनेक सपने

लांग घर की दहलीज

उन सपनों को जीने की

पर मैं आपके सपनों को अपना सपना बनुगी।

मैं न मन की स्वछन्द स्वमनी बनुगी

आप के अनुसार खुद को ढलुंगी

छोटो से प्यार बड़ो का सम्मान करुँगी

एक दिन इस घर से विदा हो

दूजे घर को चली जाऊँगी।

पर मैं अपने मन की कभी न कर पाऊँगी

आप ही बताओ बाबा क्या मैं ऐसे जी पाऊँगी।

🙏🙏🙏🙏

मैं ज्योति कुमारी, Hindipado.com पर हिंदी ब्लॉग/ लेख लिखती हूँ। मैं दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हूँ और मुझे लिखना बहुत पसंद है।

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(ज्योति कुमारी )

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